Friday, October 9, 2026
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पश्चिम एशिया संकट के बीच मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल का स्वदेशी ‘बायोप्लान’

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उर्वरक में आत्मनिर्भरता लाने के लिए गुजरात में बायोमैन्युफैक्चरिंग हब विकसित किया जाएगा

गुजरात में जैविक खादों तथा जैविक कीटनाशकों के लिए बायोमैन्युफैक्चरिंग सुविधाएँ स्थापित करने के लिए गुजरात स्टेट बायोटेक्नोलॉजी मिशन (जीएसबीटीएम) और आणंद कृषि विश्वविद्यालय के बीच आज (शुक्रवार, 9 अक्टूबर) भावनगर में समझौता ज्ञापन होगा

गांधीनगर, 09 अक्टूबर : पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और अस्थिरता ने वैश्विक उर्वरक आपूर्ति को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात में जैविक उर्वरकों और जैविक कीटनाशकों को प्रोत्साहन तथा नवाचार को गति देने एवं परंपरागत कृषि इनपुट्स पर निर्भरता कम करने के लिए एकीकृत बायोमैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम विकसित करने का आयोजन किया गया है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग अंतर्गत कार्यरत गुजरात स्टेट बायोटेक्नोलॉजी मिशन (जीएसबीटीएम) द्वारा पाँच वर्षों में लगभग 50 करोड़ रुपए के खर्च से इस इकोसिस्टम विकसित किया जाएगा।

जैविक खादों तथा जैविक कीटनाशकों के लिए बायोमैन्युफैक्चरिंग सुविधाएँ स्थापित करने हेतु गुजरात स्टेट बायोटेक्नोलॉजी मिशन (जीएसबीटीएम) और आणंद कृषि विश्वविद्यालय (एएयू) के बीच आज (9 अक्टूबर, शुक्रवार) भावनगर में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस अवसर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अर्जुनभाई मोढवाडिया तथा कृषि, किसान कल्याण, सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री श्री जीतूभाई वाघाणी उपस्थित रहेंगे।

इस पहल का उद्देश्य राज्य में उपलब्ध सूक्ष्मजीव संसाधनों, कृषि विश्वविद्यालयों, बायोटेक्नोलॉजी संस्थानों, स्टार्टअप्स, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमईस), सहकारी संस्थाओं व किसानों को एक साथ जोड़ना है। इसके तहत सूक्ष्मजीवों की खोज, अनुसंधान, उत्पाद की फॉर्मूलेशन प्रक्रिया, उत्पादन, खेत में परीक्षण और किसानों द्वारा इसे अपनाने; इन सभी चरणों को शामिल करने वाली एकीकृत व्यवस्था तैयार की जाएगी।

भारत की कृषि स्थितिस्थापकता मजबूत बनाने की दिशा में प्रयास

भारत में खाद की मांग का मूल्यांकन करने, स्थानीय उत्पादन और आयात के बीच समन्वय स्थापित करने तथा यूरिया, डीएपी, म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) और एनपीके जैसे सब्सिडी वाले उर्वरकों का वितरण सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्थाएँ स्थापित की गई हैं।

चुनौती केवल अधिक मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराने की नहीं है, बल्कि कृषि इनपुट्स की अधिक सक्षम एवं लचीली व्यवस्था तैयार करने की है। जैविक उर्वरक, बायोस्टिमुलेंट्स, सूक्ष्मजीवों के संयोजन और अन्य जैविक टेक्नोलॉजियाँ किसानों को अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकती हैं। साथ ही पोषक तत्वों के कार्यक्षम उपयोग और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी सहायक हो सकती हैं। परंपरागत उर्वरकों का महत्व बना रहेगा, लेकिन जैविक विकल्प कृषि इनपुट्स के स्रोतों में विविधता लाने में योगदान देंगे।

गुजरात का मजबूत वैज्ञानिक आधार

गुजरात की यह पहल राज्य में पहले से उपलब्ध अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण की क्षमता के आधार पर आगे बढ़ रही है। आणंद कृषि विश्वविद्यालय द्वारा एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, राइजोबियम, फॉस्फेट को घुलनशील बनाने वाले बैक्टीरिया तथा पोटेशियम को गतिशील करने वाले बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके जैविक उर्वरकों की तकनीक विकसित की गई है और इसका व्यावसायीकरण भी किया गया है। विश्वविद्यालय ने बायो-एनपी और बायो-एनपीके सहित सूक्ष्मजीवों के संयोजन भी विकसित किए हैं।

आणंद कृषि विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 2024-25 तक लगभग 42 लाख लीटर जैविक उर्वरक का उत्पादन करके बिक्री की गई है।

आणंद कृषि विश्वविद्यालय के पास जैविक उर्वरकों, जैविक कीटनाशकों और जैविक अपघटकों के विकास के लिए उपयोगी 1,000 से अधिक सूक्ष्मजीव संवर्धनों का संग्रह भी उपलब्ध है। इसके अलावा, 148 सूक्ष्मजीव स्ट्रेन्स के डीएनए सीक्वेंस का डेटा नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन (एनसीबीआई) के पास जमा कराया गया है।

प्रस्तावित पहल के चार मुख्य स्तंभ

यह कार्यक्रम चार परस्पर जुड़े हुए घटकों पर केंद्रित रहेगा।

पहले घटक के रूप में आणंद कृषि विश्वविद्यालय में केन्द्रीय बायो-स्ट्रेन रिपॉजिटरी और पायलट सुविधा स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसके तहत 528.96 वर्ग मीटर क्षेत्र में बायोरिपॉजिटरी और 1,054 वर्ग मीटर क्षेत्र में पायलट-स्केल सुविधा विकसित करने का आयोजन है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य 5,000 से अधिक स्थानीय सूक्ष्मजीव स्ट्रेन्स का संरक्षण, 500 से अधिक स्ट्रेन्स की जीनोमिक सीक्वेंसिंग, डिजिटल गुजरात बायो-स्ट्रेन डेटाबेस की स्थापना और 10 से अधिक नए बायो-फॉर्मूलेशन्स विकसित करना भी है।

दूसरा स्तंभ : स्टार्टअप्स और एमएसएमई के लिए उत्पादन सुविधाएँ

इस पहल के तहत स्टार्टअप्स, छोटे उद्योगों, सहकारी संस्थाओं, गैर-सरकारी संगठनों और किसान उत्पादक संगठनों को पायलट स्तर पर उत्पादन क्षमता विकसित करने के लिए सहायता प्रदान की जाएगी। इस उद्देश्य के लिए 13 करोड़ रुपए का आवंटन करने का प्रस्ताव है।

तीसरा स्तंभ : वैज्ञानिक परीक्षण और खेत स्तर पर प्रदर्शन

इस घटक अंतर्गत विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में जैविक उत्पादों का परीक्षण किया जाएगा। गुजरात के कृषि विश्वविद्यालयों के नेटवर्क के माध्यम से किसानों के लिए प्रदर्शन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।

चौथा स्तंभ : सहकारी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्पादन

इस पहल के चौथे घटक अंतर्गत सहकारी संस्थाओं के सहयोग से बड़े पैमाने पर उत्पादन सुविधाएँ स्थापित करने का आयोजन है। इसके लिए सहकारी दुग्ध संघों जैसे अमूल, बनास, सुमूल और कृभको सहित सहकारी संस्थाओं के सहयोग से स्वचालित फर्मेंटेशन, फॉर्मूलेशन और पैकेजिंग सुविधाएँ विकसित करने का प्रस्ताव है।

प्रयोगशाला के अनुसंधान से किसानों के खेतों तक

इस कार्यक्रम का उद्देश्य सरकारी संस्थाओं, शोधकर्ताओं, उद्यमियों, निर्माताओं, सहकारी संस्थाओं और किसानों को एकीकृत मूल्य श्रृंखला में जोड़ना है। कृषि विश्वविद्यालय अनुसंधान और खेत स्तर पर परीक्षण में योगदान देंगे, बायोटेक्नोलॉजी संस्थाएँ सूक्ष्मजीवों की खोज में सहयोग करेंगी, जबकि स्टार्टअप्स और एमसएमएईस नवाचारों के व्यावसायीकरण में सहायक बनेंगे।

सहकारी संस्थाएँ उत्पादन क्षमता उपलब्ध कराएंगी, जबकि किसान वास्तविक कृषि परिस्थितियों में उत्पादों के परीक्षण तथा उन्हें अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

इस पहल का दीर्घकालिक उद्देश्य स्वदेशी जैविक संसाधनों को भारत में ही उत्पादित किए जा सकने वाले और बड़े पैमाने पर उपयोग में लाए जा सकने वाले कृषि उत्पादों में परिवर्तित करना है। यह पहल सफलतापूर्वक लागू की जाए, तो यह गुजरात की बायोइकोनॉमी को मजबूत बनाने के साथ कृषि क्षेत्र की स्थिरता, मिट्टी के स्वास्थ्य, किसान कल्याण और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता में भी योगदान दे सकती है।

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