Friday, April 4, 2025
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दिल्ली झूठ नहीं बोलती : एग्जिट पोल में नहीं मिली किक, तो केजरीवाल की होगी ‘एग्जिट’, भाजपा हो सकती है ‘हिट’

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1998 से 2020 तक के सभी एग्जिट पोल ने हमेशा परिणाम के निकट दिए आँकड़े

एग्जिट पोल का ट्रैक रिकॉर्ड : 5 को जिसे मिलेगा साथ, 8 को उसी का होगा ठाठ

पढ़िए दिल्ली विधानसभा चुनाव 1998 से 2020 तक के एग्जिट पोल का विश्लेषण

विश्लेषण : कन्हैया कोष्टी

अहमदाबाद, 03 फरवरी : दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के लिए 5 फरवरी को मतदान सम्पन्न होने के बाद शाम 6.30 बजे से एग्जिट पोल के आँकड़े आने शुरू हो जाएंगे। 5 फरवरी को आने वाले इन एग्जिट पोल के आँकड़े काफी हद तक 8 फरवरी को आने वाले परिणामों का संकेत कर देंगे।

दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए अब तक हुए 6 एग्जिट पोल के आँकड़े सटीक रहे हैं और परिणामों के निकट रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मतदान करने के बाद दिल्ली के मतदाता झूठ नहीं बोलते और सर्वे करने वाली एजेंसियों की सच बताते हैं। ऐसे में दिल्ली में 8 फरवरी को दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आआपा), दिल्ली के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा-बीजेपी) तथा देश के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में से कौन बाजी मारेगा, इसका संकेत 5 फरवरी की शाम आन वाले एग्जिट पोल के आँकड़ों में मिल जाएगा। दिल्ली में 1998 के एग्जिट पोल ने सत्ता परिवर्तन का संकेत दिया और परिणामों में सत्तारूढ़ भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। 2003 और 2008 के एग्जिट पोल ने सत्तारूढ़ कांग्रेस की वापसी का अनुमान व्यक्त किया, जो सटीक सिद्ध हुआ। 2013 के एग्जिट पोल ने केजरीवाल को उभारा और त्रिशंकु विधानसभा का संकेत दिया और ऐसा ही हुआ भी। 2015 और 2020 के एग्जिट पोल ने केजरीवाल को भारी जीत का संकेत दिया और परिणामों में केजरीवाल तथा आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड जीत दर्ज की।

दिल्ली के एग्जिट पोल के इस इतिहास के आधार पर कहा जा सकता है कि 5 फरवरी को आने वाले एग्जिट पोल में अगर सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी पिछड़ी, तो केजरीवाल का सत्ता में वापसी आना मुश्किल हो सकता है। साथ ही; एग्जिट पोल के पुराने रिकॉर्ड के अनुसार 5 फरवरी को एग्जिट पोल में जिस पार्टी ने बढ़त बनाई, वही सत्ता में आएगा।

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में वैसे तो मुख्य मुकाबला आआपा तथा भाजपा के बीच है, परंतु पिछले दो चुनावों से हासिये पर रही कांग्रेस भी इस बार पूरा दम-खम लगा रही है। लोकसभा चुनाव 2024 में अरविंद केजरीवाल के साथ कंधे से कंधा मिला कर चुनाव मैदान में उतरने वाली कांग्रेस ने 8 महीने पुरानी दोस्ती को ताक पर रखते हुए केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। कांग्रेस शीला दीक्षित के पंद्रह साल के शासन के नाम पर फिर एक बार दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने को आतुर है, तो दूसरी तरफ लोकसभा चुनावों में लगातार तीन बार 7-7 सीटें जीतने के बावजूद दिल्ली में सत्ता हासिल न कर पाने के अपने 27 वर्ष के रिकॉर्ड से पीछे 1993 वाली जीत के लिए ‘अभी नहीं, तो कभी नहीं’ या डू ओर डाई की रणनीति के साथ केजरीवाल को घेर रही है।

अब नजरें एग्जिट पोल पर

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के लिए चुनाव प्रचार अभियान सोमवार शाम खत्म हो गया और अब सभी निगाहें एग्जिट पर टिक गई हैं, जो 5 फरवरी को आने वाले हैं। वैसे लोकसभा चुनाव 2024 और उसके बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू-कश्मीर जैसे बड़े राज्यों में हुए चुनावों में एग्जिट पोल के आँकड़ों और परिणामों में कई जगह असंतुलन दिखाई दिया, जिससे लोगों में एग्जिट पोल के आँकड़ों पर संदेह पैदा हुआ। विशेषरूप से हरियाणा में एग्जिट पोल के आँकड़े परिणामों में पूरी तरह पलट गए, तो महाराष्ट्र में किसी भी एग्जिट पोल ने भाजपा महायुति को भारी बहुमत नहीं दिया था, जबकि परिणामों में भाजपा और उसकी महायुति को जबर्दश्त सफलता मिली।

दिल्ली में संदेह की गुंजाइश कम

हालाँकि दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर 5 फरवरी को आने वाले एग्जिट पोल पर संदेह की गुंजाइश कम रहेगी और इसके पीछे का कारण है पिछले 6 एग्जिट पोल के सटीक अनुमान। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए पहली बार एग्जिट पोल 1998 में किया गया। तब से लेकर 2025 यानी 6 एग्जिट पोल हो चुके हैं और हर एग्जिट पोल चुनाव परिणामों के निकट रहा है। इतना ही नहीं; इन 6 एग्जिट पोल में जिस पार्टी ने बाजी मारी, परिणामों में उसे या तो एग्जिट पोल के आसपास सीटें मिलीं या फिर उससे अधिक। ऐसे में पुराने आँकड़ों को आधार बनाया जाए, तो दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के लिए 5 फरवरी को आने वाले एग्जिट पोल का रुझान जिस पार्टी की ओर रहेगा, उसी की जीत की संभावना रहेगी।

5 को पिछड़े, तो केजरीवाल रिटर्न मुश्किल

दिल्ली विधानसभा चुनाव 1998 से 2020 तक के आँकड़ों पर गौर करें, तो स्पष्ट पता चलता है कि जो पार्टी एग्जिट पोल में पिछड़ती है, उसका सत्ता में आना मुश्किल हो जाता है। इसीलिए यदि 5 फरवरी के एग्जिट पोल में आआपा को कम नंबर आए, तो केजरीवाल का सत्ता में लौटना मुश्किल हो जाएगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि दिल्ली के 6 एग्जिट पोल यही कहानी कहते हैं।

इतिहास तो यही कहता है : जो एग्जिट पोल में आगे, वही सत्ता में आगे

1998 – सबसे पहले देखते हैं 1998 में हुए पहले एग्जिट पोल और वास्तविक परिणामों के आँकड़े। दिल्ली विधानसभा चुनाव 1998 में सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला था। चुनाव में प्याज की महंगाई का मुद्दा छाया हुआ था और इसका असर मतदान व एग्जिट पोल में दिखाई दिया। यही कारण है कि 1998 में हुए 3 एग्जिट पोल में विपक्ष कांग्रेस को 49 से 53 सीटें मिलती दिखाई गईं, वहीं सत्तारूढ़ भाजपा को 14 से 17 सीटें व अन्य को 3 से 5 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया। परिणाम भी इसी के अनुरूप रहे। कांग्रेस 52 सीटों के साथ सत्ता में आई, जबकि 15 सीटें पाकर भाजपा सत्ता से बाहर हो गई।

2003 – इस चुनाव के लिए घोषित हुए एग्जिट पोल के अनुमान कांग्रेस के पक्ष में थे और परिणाम भी वही रहे। एग्जिट पोल में कांग्रेस के 38 से 47 सीटों के साथ सत्ता में लौटने की भविष्यवाणी की गई, जबकि भाजपा की सीटें 20 से 28 बताई गईं। परिणाम एग्जिट पोल के आँकड़ों से मेल खाते दिखे, क्योंकि कांग्रेस 47 सीटों के साथ सत्ता में वापसी करने में सफल रही, जबकि भाजपा 20 सीटों पर सिमट गई।

2008 – इस चुनाव में भी एग्जिट और एग्जैक्ट पोल में ज्यादा अंतर नहीं रहा। एग्जिट पोल में जहाँ कांग्रेस को 39 से 43 सीटों के साथ सत्ता में वापसी का संकेत दिया गया, वहीं भाजपा के फिर एक बार 25 से 33 सीटों पर रहने का अनुमान व्यक्त किया गया। परिणामों पर नजर डालें, तो कांग्रेस ने 43 सीटों के साथ एग्जिट पोल के अनुमान के अनुसार सत्ता में वापसी की, जबकि भाजपा को 23 सीटें ही मिलीं।

2013 – दिल्ली की राजनीति में यह चुनाव पहली बार द्वदलीय चुनावी व्यवस्था से परे था, क्योंकि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी का उदय हो चुका था। पहली बार चुनाव लड़ रही आआपा पर राजनीतिक गलियारों में इतनी चर्चा नहीं थी, लेकिन एग्जिट पोल ने जनता का मन पढ़ लिया था। इस चुनाव में केजरीवाल के उतरने से त्रिकोणीय मुकाबला हुआ। 2013 के एग्जिट पोल ने फिर एक सही आकलन करते हुए लगभग त्रिशंकु विधानसभा का संकेत दिया। एग्जिट पोल में सत्तारूढ़ कांग्रेस को केवल 9 से 17 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया, जबकि भाजपा को 29-42 और नई आआपा को पहले ही चुनाव में 19 से 31 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया। परिणाम बिलकुल एग्जिट पोल के साथ गए और सत्तारूढ़ कांग्रेस 8 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा 31 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी, वहीं नई आम आदमी पार्टी ने पहले ही चुनाव में 28 सीटें हासिल की।

2015 – दो वर्ष में ही दिल्ली में मध्यावधि चुनाव हुए। पंद्रह साल तक शासन करने वाली कांग्रेस अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी, तो आम आदमी पार्टी और केजरीवाल का दबदबा काफी हद तक बढ़ चुका था और भाजपा के समक्ष लोकसभा चुनाव 2014 की भारी जीत को दोहराने के साथ ही अब चुनौती के रूप में कांग्रेस नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी थी। इस चुनाव के लिए हुए सभी एग्जिट पोल ने सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को बहुमत दिया। एग्जिट पोल के अनुसार आम आदमी पार्टी को 35 से 46 सीटें मिलती बताई गईं, जबकि भाजपा को 19 से 33 एवं कांग्रेस को 0 से 5 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया। परिणाम एग्जिट पोल की सीमा को पार कर गए और आम आदमी पार्टी ने 67 सीटों की ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि भाजपा 3 सीटों पर सिमट गई और कांग्रेस लुप्त हो गई। 2020 – इस चुनाव में भी एग्जिट पोल की धारा फिर एक बार सही दिशा में बही। भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2019 की जीत को बनाए रखने की भरसक कोशिश की, लेकिन एग्जिट पोल ने घोषणा कर दी कि अरविंद केजरीवाल तथा आम आदमी पार्टी 44 से 68 सीटों के साथ सत्ता में वापसी करने जा रहे हैं। एग्जिट पोल में भाजपा को 2 से 26 सीटें और कांग्रेस को 0 से 4 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया। परिणाम एग्जिट पोल की धारा के साथ सटीक बैठे और आम आदमी पार्टी 62 सीटों के साथ दूसरी ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए सत्ता में लौटी, जबकि भाजपा को 8 सीटें मिलीं। कांग्रेस फिर लुप्त ही रही।

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